मिल बांचें : मध्यप्रदेश - आकांक्षा बैगा के सपने अब मेरे सपने हो गए


“मिल बांचें मध्यप्रदेश”
जबलपुर से 54 किलोमीटर  दूर बम्हनी  पंचायत में तीन गाँव हैं बम्हनी, बासनपानी धवई, बासनपानी ग्राम के ईजीएस स्कूल   मेरे आकर्षण का कारण इस वज़ह से  है क्योंकि यह स्कूल दूरस्थ पहाड़ी इलाके में स्थित किसी गुरुकुल का एहसास देता है . बम्हनी पंचायत के  आदिवासी बाहुल्य गाँव बासनपानी स्थित ईजीएस स्कूल डायस क्रमांक 23390100501 की दर्ज संख्या 41 है उपस्थिति अक्सर 25 से 35 के आसपास रहा करती है. आज मुझे 26 बच्चों से मुलाक़ात हुई 
 शिक्षिका श्रीमती जमना राजपूत के अनुसार स्कूल में अनुपस्थिति अभिभावकों के  रोज़गार-प्रवास की वज़ह से हुआ करती है.  इस बात की तस्दीक आंगनवाडी कार्यकर्ता की .
स्कूल में बच्चों से बातचीत के दौरान पूरे स्कूल की सबसे अधिक ज्ञान रखने वाली कु. आकांक्षा बैगा ने मेरे हर सवाल का ज़वाब दिए. आकांक्षा जानती है कि निर्जलीकरण क्या है. दस्त की बीमारी के लिए ज़रूरी  ओआरएस के साथ जिंक की गोलियाँ आँगनवाड़ी केंद्र पर या ग्राम आरोग्य केंद्र पर मिलती है. उसे प्रदेश के मुख्यमंत्री जी, और प्रधानमंत्री जी  का नाम भी याद है.  इतना ही नहीं बालिका आकांक्षा बैगा को अखबार पढ़ना रेडियो सुनना यानी हर सामान्य जानकारीयों के लिए उत्सुकता बनी रहती है.
वास्तव में राज्य शासन का यह अभियान एक पाजिटिव सोच से उपजा सूत्र है – “मिल बांचें मध्यप्रदेश” मध्यप्रदेश जो शहरों से ज़्यादा गाँवों में बसता है ....... इस प्रदेश को हर विचारक को बांचना ही होगा. यहाँ हर एक्टिविस्ट को अन्त्योदय के लिए केवल सरकारी कार्यक्रम मानना गलत है. एक्टिविस्ट्स खुद को आगे लाएं बिना किसी राग-द्वेष के बच्चों में शिक्षा के वो गैप्स भरें जो ज़रूरी हैं. आज यानी 18 फरवरी 17 को मैं एक वालेंटियर के रूप में जुड़ा हूँ. पर  इस जुडाव को  अभियान के ख़त्म होने पर भी हर माह में एक बार जो यथा परिस्थिति  माह के हर तीसरे शनिवार होगा  को बम्हनी पंचायत के  आदिवासी बाहुल्य गाँव बासनपानी स्थित ईजीएस स्कूल डायस क्रमांक 23390100501 उस स्कूल में जाकर बच्चों से मिलना मेरी ज़वाबदारी रहेगी. उनमें क्रिएटिविटी तलाश कर उसमें रंग भरने की कोशिश भी रहेगी .
चर्चा के दौरान अधिकाँश बच्चों ने शहरी बच्चों की तरह ये तय नहीं किया कि उनको पढ़लिख कर वे क्या करेंगें..? परन्तु आकांक्षा बैगा को अच्छी नौकरी करने की बात सामने आई उसका यह सपना अब से  मेरा हुआ. आकांक्षा बैगा... बेशक एक अधिकारी भी बन सकती है. अगर वो अधिकारी बनाना चाहती है तो उसके लिए सतत अध्ययन के अवसरों में कमी न आए इस कोशिश का संकल्प भी लेता हूँ.
बच्चों ने बताया – उनके परिवारों में शौचालय का उपयोग नहीं किया जाता. आज भी वे खुले में शौच के लिए जाते हैं तो दुःख अवश्य हुआ. परन्तु बच्चों के ज़रिये इस बदलाव को लाना संभव है ऐसा मेरा मानना है. बच्चों को जब पहाड़ काट के रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी की कहानी सुनाई तो अधिकाँश बच्चे हतप्रभ थे तभी बच्चों से चर्चा के दौरान पता चला कि उनमे क्रिएटिविटी है जिसे पहचानना ज़रूरी है. इसकी पुष्टि हुई शर्मीले कृष्णा उर्फ़ श्यामलाल की सृजन शीलता से उस बच्चे ने मिट्टी से ट्रेक्टर का छोटा सा माडल बनाया था. जिस बच्चे में भी मुझे ज़रा भी क्रिएटिविटी नज़र आई उसे पदक देने से मुझे बेहद संतोष मिला.
पदक किस किस को मिले
1.  कु. आकांक्षा बैगा      स्वर्णिम पदक
2.  श्यामलाल (कृष्णा)   स्वर्णिम पदक
3.  सरस्वती                रजत पदक
4.  अरविन्द                 रजत पदक
5.  नीतू                       कांस्य पदक
6.  रामकुमार               कांस्य पदक         
                         
                          मेरा संकल्प
बम्हनी पंचायत के  आदिवासी बाहुल्य गाँव बासनपानी स्थित ईजीएस स्कूल डायस क्रमांक 23390100501 के बच्चों  लिए शैक्षिक संसाधन यथा बालोपयोगी कहानी कविताओं की पुस्तकें, बच्चों को उनकी मांग अनुसार चित्रकला के लिए 41 सेट ड्राइंग अभ्यास बुक देना मेरी ज़वाब देही होगी . एक सप्ताह में यह सामग्री स्कूल भेज दी जावेगी . 
youtube पर देखिये आकांक्षा बैगा  

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