बम फोड़ने वाला डिसीप्लीन इंचार्ज सागर सोनी


कोई ऐसा न होगा जिसने बचपन में कोई शरारत न की हो . अगर कोई बच्चे से शरारत का एकाधिकार छीनता है तो मुझे कोफ़्त अवश्य होती है.मेरी नज़र में शरारत पर बच्चों का एकाधिकार होना चाहिए चाहिए क्या होता ही है. पर उन गार्जियंस एवं अभिभावकों से असहमत हूँ जो तानाशाह की तरह बच्चे के इस नैसर्गिक अधिकार यानी शरारत के अधिकार को छीनते हुए अपने विचार थोंपते हैं. ऐसे अभिभावकों एवं शिक्षकों को जान लेना चाहिये कि सबसे अधिक शरारत करने वाले बच्चे सबसे अधिक क्रिएटिव होते हैं. इसके दो उदाहरण मैंने 2014 से बालभवन में आने के बाद देखे . एक है अक्षय ठाकुर शरारत का बफर स्टाक था ये बालक जब सुना था कि भाई को बालभवन के नाट्य-निर्देश भाई संतोष राजपूत जी ने प्ले से हटा दिया था. खेल टीचर जिन पर अनुशासन बनाए रखने की भीषण जवाब देही बाय डिफाल्ट होती है से भाई अक्षय ने किसी मुद्दे पर नाराज़ होकर अपनी नाराज़गी को डिफ्यूज करने की गरज से बालभवन में भयानक टाइप का सुतली बम फोड़ा पकड़ा भी गया सज़ा भी मिली . ये वही बच्चा है जो अब एम.पी.एस.डी. भोपाल का विद्यार्थी है. नाटक की लगन इसे ऐसा विद्यार्थी बना दिया है जो खुद कर कर के बहुत कुछ सीख चुका जाने कितने नाटक लिखे किये जुनून ऐसा कि 104 डिग्री बुखार भी न रोक पाया एक्टिंग करने से 

हाँ तो आइये वापस आते हैं उसी के नक्श-ए-क़दम पर चलने वाले सागर सोनी पर लड़ाई झगड़े में अव्वल सागर ( Sagar Soni ) ने एक बार खेल टीचर देवेन्द्र यादव जी से नाराज़ होने पर खेल कक्ष में बम फोड़ने की योजना बनाई यादव जी की चौकन्नी नज़र से सम्हाल कर सागर ने अगरबत्ती में बम को ऐसे सेट किया कि बम तब फूटे जब वो घर पहुँच कर किसी काम में व्यस्त हो जाए. उसके साथ शुभम , अंकित उर्फ़ टमाटर, आकाश राठौर , विशाल , यश गुप्ता इस षड्यंत्र के राज़दार थे . 
जब बम ब्लास्ट हुआ तब तक सागर सोनी की पतंग आकाश में गोते लगा रही थी . शुभम ने ज़ल्द ही राज़-फाश कर दिया . सागर को बुला कर मैंने उसका कुछ दिनों के लिए बालभवन में प्रवेश वर्जित भी किया. 
घर जाकर बड़ी मासूमियत से सागर ने बताया कि – कितनी गलत बात है ताई जी, बताओ किसी लड़के ने बालभवन की टायलेट में बम फोड़ा . 
सभी उसकी दी गई खबर से दुखी भी हुए. ताई जी को भी बहुत पीढ़ा हुई . परिवार सागर की मासूमियत को तब जान पाया जब सागर की माताजी को बुला कर बताया गया कि – बम ब्लास्टिंग का असली विलेन सागर ही है. उसे कुछ दिनों के लिए बाल भवन से सस्पैंड किया है. अब उसे वापस आने की अनुमति है. आप ज़रा ध्यान रखिये. जब माँ ने सागर की ताई जी को यह खबर दी तो ताई जी ने झाडू से शरारत का भूत उतारा . पूरे परिवार ने सागर की जम के क्लास भी ली. कुछ दिनों पहले ही सागर के पिता जी का उनको छोड़ कर जाना मेरे लिए भी दुःख का कारण था. सागर जैसे बच्चे गीली मिट्टी होते हैं हम सभी के मन में सागर के लिए गहरी संवेदनाएं भी थीं . 
16 साल की उम्र पूर्ण होने पर सागर को 2017 में बालभवन से जाना पड़ा . तब तक सागर ने बॉबी में बेहतरीन अभिनय कर मेरे सपने को पूरा किया. मुझे विश्वास है कि जो जितना शरारती होता है वो ख़ास तरह की आतंरिक उर्जा से भरा होता है. सागर ने मेरी थ्योरी की पुष्टि की अक्षय की तरह . 
सागर ने अब थियेटर को ज़िंदगी का अहम मक़सद बना लिया है. नाट्यलोक संस्था के साथ जुड़कर थियेटर में सक्रीय है सागर गंभीर भी है . आज यानी 3 अगस्त 2018 को स्कूल ग्रेसियस कान्वेंट की ड्रेस में हमसे मिलने आए इस किशोर की जेब के उपर “डिसीप्लीन-इंचार्ज” की नाम पट्टी देख मुझे बेहद खुशी हुई . परन्तु हमने मज़ा लेते हुए उससे सवाल किया .. भाई तुमको डिसीप्लीन इंचार्ज किसने बनाया . और फिर देर तक बीते दिनों के किस्से ताज़ा हो गए. हम सब देर तक हँसते रहे सागर मस्ती के किस्से सुनाता रहा

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